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संकल्प की शक्ति | प्रेरणादायक कविता | एडवोकेट पुष्प सिंगला

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1.संकल्प ही सुदृढ़ तो मुश्किल विकल्प की क्या हो सामने डगर तो अगर मगर क्या

2.घिरते रहे हमेशा आपद विपद के बादल बढ़ते रहे बटोही मिलती रही है मंजिल सागर ने रह दी है चलते ही जो रहे है माना की बढ़ रहा है

3.जोखिम की बिजलियों से नित सामना हो जिनका क़ुर्बानिओ से रोशन हर रास्ता हो जिनका घर में ही बैठकर जो कांटो की फ़िक्र करते है फिर वन को कौन जाता है रावण से कौन लड़ते आतंक के घनेरे घन गरजते रहे है, सागर ने रह दी है मन की बढ़ रहा है अवरोश का अँधेरा घर फूँक निज जो निकला लाएगा वह सवेरा

ऐडवोकेट पुष्प सिंगला