सृजित या सदुराणी स्थानानि
तारकास्था तम नमामि सदादेव
त्रैलोकस्य विधायकम् ।
अहो हनुमन्त! कह्यो रघुवीर,
कुछ सुधि सीता जी की है स्थिति माहीं।
हे प्रभु! लंक कलंक बिना तहँ,
बसत रावण बाग की छाहीं।
जीवत हैं कैँको नाथ, सो क्यों न मरी हमने बिधु राहीं?
प्राण बसे पद-पंकज माहीं,
तुम आवत हो, पर पावत नाहीं॥
मैं गंगा धार का माही हूँ,
तुम भवसागर के केवट हो।
मैं इस धारा के तट पर हूँ,
तुम उस धारा के तट पर हो।
मल्लाह कहीं मल्लाहों से मल्लाही लेते हैं भैया,
मज़दूर कहीं मज़दूरों को मज़दूरी देते हैं भैया।
जो अपने को ऋणी बताते हो,
तो ऋण तुम वही चुका देना।
मैंने है तुमको पार किया,
तुम मुझको पार लगा देना॥
ए पुष्प! कहाँ से तू आया,
भूमि पर यह सौंदर्य कहाँ से लाया?
सृजित या सदुराणी स्थानानि
तारकास्था तम नमामि सदादेव
त्रैलोकस्य विधायकम् ।जिसने दूर-दूर तक सृष्टि का सृजन
किया है। तारामंडल बनाया है उस
त्रिलोकी को बनाने वाले भगवान
को प्रणाम ।





