देवा हो देवा गणपति देवा
तुम से बढ़कर कौन स्वामी तुम से
और तुम्हारे भक्त जनों में हमसे बढ़कर कौन
हर शुभ कार्य की शुरुआत में शंकर पुत्र गणेश की पूजा की जाती है जिन्होंने अपने जीवन में घोर कष्ट झेला फिर ऋद्धि-सिद्धि के पति कहलाए।
कहा जाता है कि देवता की उपाधि उसे ही मिलती है जिन लोगों के गला यहाँ से हम भोजन खाते हैं, भोजन पचाने से विसर्जन तक यह सिस्टम कभी भी लगा ही नहीं होता। तभी तो हम कहते हैं कि देवता लोग हवन के धुंए से ही पुष्ट होते हैं। वे जन-साधारण की तरह अन्न-पानी नहीं खाते। वे सकाम भाव से देवी किसी देवता को देख भी लेती हैं तो वे लोग धरती पर जन्म लेकर ही सांसारिक सम्बन्ध बना पाते हैं।
इतना घना ज्ञान रखने वाली एडवोकेट पुष्प सिंगला भौतिक सम्बन्धों का सुख नहीं ले पाई जब तक सूरज चाँद रहेगा सिंगला पुष्प सिंगला का नाम रहेगा। हम उनके चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। वह कीचड़ में कमल की तरह खिलती रही निर्लेप। घर वालों ने बार-बार घर बसाने को कहा। बोली, सुख मिलना होता तो पहली बार में ही मिल जाता।
यह दुख जो तुमको मिला है निज कर्म का लेखा
चुकता है जो पहले दिया सो मिलता है
फरियाद न कर फरियाद न कर
यह हीरा जन्म तुझे अनमोल मिला बरबाद न कर
भोजन भजन खजाना नारी
चारों परदे के अधिकारी





