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भक्ति की महिमा और जीवन में प्रेम का संदेश

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शबरी कब थी बड़ी रूपवती,
सुवर्ण कहाँ रसखान रहे।
गज-गीध ने कौन सा वेद पढ़ा,
धरते कब केवल ध्यान रहे।
महिमा यह केवल भक्ति की है,
वश भाव के ही भगवान रहे।

वेदमाता गायत्री

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

सर्व-व्यापक और सर्व-प्रकाश परमेश्वर से प्रार्थना है कि मन मांगी पुण्यार्थ सुख-शान्ति और प्रभु की कृपा से हम सबका कल्याण हो तथा चारों ओर से सुख की पुष्टि हो।

मण्डी अहमदगढ़ की गर्ग पुत्री, सूनाम की सिंगला परिवार की पुत्रवधू बनी।
जब तक सूरज-चाँद रहेगा, गर्ग पुत्री और पुत्र सिंगला का नाम रहेगा।

प्रेम और खुशियाँ बाँटने का संदेश

आइए बहार को हम बाँट लें,
जिन्दगी के प्यार को हम बाँट लें।
मिलकर रोएँ, मिलकर मुस्कराएँ हम,
अपनी जीत-हार को हम बाँट लें।

जिसके पास हो खुशी, थोड़ी सी खुशी दे दे,
जो बेबस हो बेचारा, अपनी बेबसी दे दे।
आँसुओं की धार को हम बाँट लें,
जिन्दगी के प्यार को हम बाँट लें।

यह संदेश हमें बताता है कि सच्ची भक्ति रूप, विद्या या बाहरी आडंबर की मोहताज नहीं होती। भगवान भाव के वश में होते हैं। उसी प्रकार जीवन की वास्तविक सुंदरता भी इसी में है कि हम अपनी खुशियाँ और अपने दुख दूसरों के साथ बाँटें और एक-दूसरे का सहारा बनें।