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ईश्वर की माया, कहीं धूप कहीं छाया

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ईश्वर की
माया कहीं धूप कहीं छाया

सब को जग भाया

पानी हमेशा नीचे की ओर बढ़ता
है भाप बन-

कर उड़ जाता है सूर्य के तेज
से, बारिश

बन कर सबके सिर पर पड़ता है।
गंगा

कभी गंगोत्री में वापिस नहीं
मिलती जो

कि उसका उद्गम स्थल है ठीक इसी
तरह

समाज की भी कुछ मर्यादाएं हैं
जो कि

सब लोग जानते हैं कोई भी
अनभिज्ञ नहीं

महान लोग तुच्छ चीजों से ऊपर
उठ जाते

हैं। कौन हूं मैं क्या नाम है
मेरा मैं कहां

से आई हूं मैं परियों की
शहजादी मैं

आसमां से आई हूं। मण्डी
अहमदगढ़ की

गर्ग पुतरी सुनाम की सिंगला
पुत्तरवधू से

कहिए जब तक सूरज चांद रहेगा
गर्ग पत्नी

पुण्य सिंगला का नाम रहेगा।

देव तुम्हारे कई उपासक कई ढंग
से आते हैं

सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई
रंग की लाते हैं।

मैं ही हूं गरीबनी ऐसी जो कुछ
साथ नहीं लाई

फिर भी साहस कर मन्दिर में
पूजा करने को आई

धूप-दीप नैवेद्य नहीं है झांकी
का श्रृंगार नहीं

पहाड़ गले में पहनाने को फूलों
का भी हार नहीं

कैसे करूं कीर्तन मेरे स्वर
में माधूर्य नहीं

मन का भाव प्रकट करने को वाणी
में चातुर्य नहीं

नहीं दान है नही दक्षिणा खाली
हाथ चली आई

पूजा की विधि नहीं जानती फिर
भी नाथ चली आई

चरणों पर
अर्पित है इसको चाहो तो स्वीकार करो

यह तो वस्तु तुम्हारी ही है
ठुकरा दो या प्यार करो

धूम-धाम से साज बाज से वे
मन्दिर में

आते हैं।

मुक्ता मणि बहुमूल्य वस्तुएं
लाकर तुम्हें

चढ़ाते हैं।